कैसे हुआ राहु-केतु का जन्म?

702.jpg

लेखक: सोनू शर्मा

ज्योतिष शास्त्र में राहु-केतु को छाया ग्रह की कोटि में रखा जाता है और राहु-केतु को अशुभ ग्रह की दृष्टि से देखा जाता है, सभी लोग इनसे डरते है । ये दोनों ग्रह बहुत ही प्रभावशाली माने जाते है। चन्द्रमा और सूर्य को ग्रहण राहु-केतु ही लगाते है।

ऐसी कथा प्रसिद्ध है की राजा हरिण्यकश्यप को कोई नहीं मार सकता था, उनकी व उनके पुत्र की रक्षा के लिए भगवान विष्णु को नरसिंह के रूप में अवतार लेना पड़ा । राजा हरिण्यकश्यप की पुत्री सिंहिका का विवाह विप्रचिती असुर से हुआ, इन दोनों का एक पुत्र हुआ जिसका नाम राहू या स्वरभानु रखा गया, राहु असुर थे ।

ऐसी मान्यता प्रचलित है की देवताओं और असुरो में अमृत प्राप्ति के लिए  क्षीरसागर का मंथन किया गया और इस मंथन के उपरांत महर्षि धनवंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए और वह अपने साथ १४ रत्न भी लाए थे ।

भगवान विष्णु ने असुरों को मोहपाश में बांधकर देवताओं को अमृत पान कराया, धोके से राहु, सूर्य व चन्द्रमा के बीच में बैठ गए। विष्णु ने क्रोधित होकर राहु का सिर धड़ से अलग कर दिया लेकिन तब तक राहु अमृत पी चुके थे और वह अमर हो गए थे । सिर को राहू तथा धड़ को केतु का नाम दिया गया।

एक मान्यता के अनुसार राहु को सर्प का शरीर और केतु को सर्प का सिर प्राप्त हुआ, इसीलिए राहु व केतु सूर्य और चंद्रमा से द्वेष रखते है तथा इसको ग्रहण लगाते है, और इसी तरह उनसे अपनी शत्रुता दिखाते है।